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भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में
श्री लालकृष्ण आडवाणी के समापन भाषण के मुख्य बिन्दु

यह एक संयोग है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नितीन गडकरी द्वारा गठित नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की पहली बैठक 12 व 13 जून की तय की गई। लेकिन कल ज्यों ही मैंने अपना साप्ताहिक ब्लॉग लिखना शुरू किया तो स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में 12 जून के महत्व का मुझे स्मरण हो आया (ब्लॉग की प्रति संलग्न)।

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पटना में हमारी बैठक में हुआ विचार-विमर्ष पूर्णतया संतोषजनक रहा। एजेन्डे के दो मुख्य बिन्दु थे :


तीन प्रस्ताव :  एक - माओवादी गतिविधियों का विस्तार और दूसरा - यू.पी.ए.-II : निराशा और असफलता का एक वर्ष और तीसरा - भारतीय संघ के संघीय ढांचे पर केन्द्र के हमले संबंधी प्रस्ताव।

तीन प्रतिवेदन : (एक) पार्टी समिति की भारत-तिब्बत सीमा पर हुए अतिक्रमणों पर प्रारम्भिक रिपोर्ट। (दूसरा) - आजीवन सहयोग निधि के बारे में प्रतिवेदन और ( तीसरा ) सुराज संकल्प।

मैं समझता हूं कि इन सभी दस्तावेजों में से भारतीय संघ के संघीय ढांचे पर केन्द्र के हमले वाला प्रस्ताव और भारत-तिब्बत सीमा पर गई समिति का प्रतिवेदन सर्वाधिक महत्व का और उत्साहवर्धक रहा। कल शाम को जब हमारे दोनों संसद सदस्य श्री भगत सिंह कोशियारी और श्री राजीव प्रताप रूढ़ी ये प्रतिवेदन प्रस्तुत कर रहे थे, उस समय मैं सभागार में उपस्थित सदस्यों के चेहरों पर जिस गर्व की अनुभूति देख रहा था वह बहुत प्रसन्न करने वाली थी।

19 हजार फीट तक की ऊँचाई पर गये हमारे ये सांसद ऐसा कार्य कर पाये जो कोई और सांसद या राजनीतिक कार्यकर्ता आज तक नहीं कर पाया और जिस प्रकार के चित्र उन्होंने कार्यसमिति के सामने प्रस्तुत किये वह इस बात को स्पष्ट दर्शाते थे कि जहाँ भारत-तिब्बत सीमा के निकट चीन सड़कें, हवाई अड्डे आदि बनाने में बहुत सक्रिय है, वहीं भारत की सीमा के भीतर पूर्ण निष्क्रियता है।

सन् 2008 में मैंने जब अपनी आत्मकथा लिखी थी तो स्वाभाविक रूप से स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र का, भारतीय राजनीति का जिस प्रकार से विकास हुआ है, उसका भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के परिप्रेक्ष्य में वर्णन किया था। पुस्तक समाप्ति के बाद व्यक्तिगत रूप से मुझे संतोष हुआ था, लेकिन यह अनुभूति भी हुई कि डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, श्री नानाजी देशमुख और श्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज नेताओं द्वारा पुष्पित और पल्लवित भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी का एक विस्तृत इतिहास भी लिखा जाना चाहिए।

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मेरा जन्म 1927 में करांची (सिंध) में हुआ। जीवन के प्रथम 20 वर्ष मैंने सिंध में बिताए। मैं 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक सिंध में ही बना। 1947 मे मैं राजस्थान आया और 1957 तक वहीं रहा। 1957 के बाद ही मेरी गतिविधि का केन्द्र दिल्ली बना। राजनीति में 1951 से जनसंघ के जन्मकाल से मैं सक्रिय रहा हूं। 1952 के प्रथम आम चुनाव से 2009 के पंद्रहवें आम चुनाव तक मैंने सभी प्रत्यक्ष देखे हैं।

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राजस्थान में रहते हुए मुझे इस बात की गहरी अनुभूति हुई कि अगर स्वतंत्र भारत के नेतृत्व में सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे दूरदर्शी और दृढ़ निश्चयी नेता न होते तो इस बात की पूरी सम्भावना रहती कि स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ-साथ भारत का केवल विभाजन ही नहीं होता, संभवत: विघटन ही हो जाता।

अगस्त 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ। पं. जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने व सरदार पटेल उप-प्रधानमंत्री। शासन के सामने सबसे बड़ा कार्य था भारत भर में फैले लगभग 530 रजवाड़ों का देश के साथ एकीकरण। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरदार पटेल को यह कार्य करना था और उन्हें इसके लिए थोड़ा ही समय मिला। दिसम्बर 1950 में उनका देहान्त हो गया।

सरकार में उनके साथ एक बहुत ही श्रेष्ठ अधिकारी रहे श्री वी.पी.मेनन । श्री मेनन ने दो उत्तम ग्रंथ लिखे हैं :- एक - The Story of Transfer of Power व दूसरा : The Integration of Indian States ये दो ग्रंथ सरदार वल्लभभाई पटेल की अद्भुत प्रशासनिक क्षमता, असाधारण देशभक्ति तथा दूरदर्शिता के परिचायक हैं।

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पीछे मुड़कर देखने पर मैं यह कह सकता हूं कि अगर भारतीय जनसंघ न बना होता और डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का श्रीनगर के कारावास में बलिदान नहीं हुआ होता तो आज स्थिति ये रहती कि जम्मू कश्मीर में तिरंगा नहीं लहराया जाता, और वैष्णो देवी की यात्रा करने के इच्छुक लोग बिना परमिट के वहाँ नहीं जा सकते थे।

इतना ही नहीं वर्ष 1975-76 के इमरजेंसी काल का स्मरण करके मैं कह सकता हूँ कि अधिनायकवाद के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी और पूरे संघ परिवार ने जो जबरदस्त संघर्ष किया और जिसका सुखद परिणाम 1977 के चुनाव परिणामों में प्रकट हुआ, यदि यह न हुआ होता तो आज भारतीय राजनीति का चेहरा ही कुछ दूसरा होता। उन दिनों इमरजेंसी काल में कांग्रेसी मुखपत्र National Hearld ने इसकी लगातार वकालत की थी कि हिन्दुस्तान को बहुदलीय लोकतंत्र नहीं, अपितु अफ्रीका के कुछ देशों की तरह का एकदलीय लोकतंत्र चाहिए।

आज दुनिया भर में भारत की जो इज्जत है उसका कारण न केवल यह है कि भारत एक उदीयमान आर्थिक महाशक्ति माना जाता है वरन् यह भी है कि भारत एकमात्र विकासशील देश है जो कि इमरजेंसी के 20 महीने छोड़कर एक सफल लोकतंत्र सिध्द हुआ है।

1962 में भारत की चीन के हाथों एक अपमानजनक परायज हुई। चीन का वह आक्रमण प्रधानमंत्री पं. नेहरू के लिए जानलेवा साबित हुआ। मैं एक पत्रकार के नाते दिसम्बर 1962 में पहली बार लद्दाख गया और तीव्र अहसास हुआ कि कांग्रेस शासन देश की सुरक्षा के प्रति कितना उदासीन है।

1964 में चीन ने लोपनोर में अणु विस्फोट कर आणविक शक्ति बनने की ओर पहला कदम उठाया।

उसके तुरन्त बाद जनसंघ ने प्रस्ताव किया कि भारत को अणु बम बनाने की ओर बढ़ना चाहिए। बाकी सब हमारी आलोचना करते रहे किन्तु देश की प्रतिरक्षा को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानने वाला हमारा दल अपने लक्ष्य से कभी विचलित नहीं हुआ।

1998 में हमें अवसर मिला। घोषणा पत्र तैयार करते हुए हमने एन.डी.ए. के सहयोगी दलों को भाजपा के इस कार्यक्रम से सहमत कराया। मार्च में श्री वाजपेयी का मंत्रिमण्डल बना और मई में पोखरण हुआ। एक-एक भारतीय, भारत के भीतर और भारत के बाहर गौरव का अनुभव कर पाया।

भारतीय जनता पार्टी के एक-एक सदस्य को इस बात का गर्व होना चाहिए कि भारत की अखण्डता को बरकरार रखने में और भारत के लोकतंत्र को अक्षुण्ण बनाये रखने में और भारत को एक आणविक शक्ति बनाने में भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की अद्वितीय भूमिका रही है।

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जब मैं पिछले छ: दशकों की राजनीतिक यात्रा पर नजर दौड़ाता हूँ तो मुझे इस पर निराशा होती है कि 1947 में जो आकांक्षाएं और सपने हमने देखे थे, वे पूरे नहीं हुए हैं। प्रत्येक वर्ष जब मैं दो रिपोर्टों को देखता हूँ तो मुझे अत्यधिक दु:ख पहुँचता है; ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की वार्षिक रिपोर्ट जो भ्रष्टाचार के आधार पर तैयार सूचकांक में देशों की स्थिति दर्ज करती है, इस रिपोर्ट में भारत हमेशा ऊपरी स्थान पर रहता है। और संयुक्त राष्ट्र संघ की मानव विकास रिपोर्ट जिसमें भारत का स्थान अत्यधिक नीचे वाले देशों में रहता है।

1997 में जब भारत की आजादी के 50 साल पूरे हुए तब मैंने अपने जीवन की सबसे लम्बी यात्रा की थी। पार्टी ने इसे ''स्वर्ण जयंती रथ यात्रा'' का नाम दिया था। 

59 दिनों में सम्पूर्ण देश का दौरा करके उन सभी देशभक्तों को पार्टी की ओर से श्रध्दा-सुमन अर्पित किये थे जिनके त्याग, तपस्या और बलिदान से भारत को 1947 में आजादी मिली थी।

पार्टी ने देश को यह भी संदेश दिया था कि यदि 50 साल बीत जाने के बाद देश अभी भी पिछड़ा हुआ है, और अपनी सम्भावनाओं के अनुरूप विश्व में स्थान प्राप्त नहीं कर पाया है तो उसका कारण है कि देशभक्तों की कुर्बानियों के कारण स्वराज तो मिला, लेकिन जिन लोगों ने शासन सम्भाला था वे उसे सुराज नहीं बना पाये। भारतीय जनता पार्टी का देश को वचन है कि जहाँ-जहाँ पर हमें सरकार चलाने का अवसर मिलेगा वहाँ-वहाँ हम उसे सुराज बनाकर दिखायेंगे।

1997 में दिये गये इस वचन को 1998 मे हीं हमें केन्द्र में पूरा करने का अवसर मिला। 6 साल तक श्री वाजपेयी के नेतृत्व में एन.डी.ए. की एक शानदार सरकार चली।

आज अनेक प्रदेशों में भी हमारी जो सरकारें चल रही हैं वे भी इस वचन की पूर्ति में ईमानदारी से लगी हुई हैं; और इस प्रकार भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी जो भूमिका निभा रही है वह हमारे कार्यकर्ताओं की ताकत का चिरंतन स्रोत है और जनता में हमारे लिए बढ़ती हुई सद्भावना व साख का अमूल्य सोपान भी।